jaijalaram copyमनुष्य जन्म की सार्थकता ईश्वर प्राप्ति मे है ,ऐसा सभी धर्मो में कहा गया है ! ईश्वर प्राप्ति के लिए नित्य किये जाने वाले प्रयासों को साधना कहते है । साधना से ही मनुष्य आनन्दी एवं धर्मनिष्ठा बनता है । और साधना से ही मनुष्य के ह्रदय में प्रेम ,दया ,त्याग एवं सेवा की भावना का उद्धभव होता है । यह जीवन एक साधना है ,और सेवा कार्य से ही इसे चलाना है ,यह संस्थान का मूल मंत्र है ।

राजस्थान के आदिवासी अंचलो में गरीबी ,बेरोजगारी ,अशिक्षा ,स्वास्थ एवं मूलभूत सुविधाओं का अभाव होने के कारण व्यक्ति दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पूर्ण रूप से मजदूरी पर आश्रित है। उन्हें समय पर भोजन भी नहीं मिल पाता और इसी कारण माताओ और बहिनो को भी कई बीमारियों से ग्रसित होना पड़ता है ,जो कि पौष्टिक आहार की कमी से होती है।,फलस्वरूप वे कुपोषण के शिकंजे में आ जाती है और आने वाली पीढ़ी जन्म से पहले ही कुपोषण का शिकार हो जाती है । ऐसे वनवासी क्षेत्रों में निवास करने वाले बन्धुओ के कल्याणार्थ आप सभी का सहयोग प्राथनीय है ।